Mr Jollys Music Classes

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Indian classical and folk Music Theory

What are Shuddha, Chhayalag and Sankirn raga in Indian classical music

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 What is Shuddha, Chhayalag and Sankirn Raga in Indian classical music
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Suddha Ragas 
🎹Friends, the ragas which have the same tone in ascending ( Aroh) and descending (avroh) means that the glimpse or shadow of any other raga is not visible, then such ragas are called Shudha ragas like raga Bilawal is the tone of its ascendant are S R G M P D N S° and avroh notes are S° N D P M G R S Aroh and avroh both notes are same. but if this raga had in Aroh notes of bilawal in its and some other raga had swaras in its Notes of any raga in descent,(avroh)  then this raga would not belong to the Shudha raga but to the  chhayalag or sankrin ranges called raga. So a raga whose ascending and descending notes are the same is called a Shudha raga.
 
 
 
Chhayalag Ragas

🎼Friends, the ragas in which there is a mixture of two ragas, that is, there are some other swaras in the ascending and the notes of any other raga in the descending, then such ragas are called Chhayalag ragas, it is known by the name of such ragas that these are Chhayalag ragas such as  Basant Bahar Ahir Bhairav ​​Pooriya Dhanashree,

 

 

Sankirn Ragas
 Friends, Sankrin category ragas are taken as a feature not found anywhere else in the music of India, they are classified into different categories to understand and remember these ragas, Indian music  At some point in the middle of the history of a musicologist had presented such a classification of ragas, in which all the ragas were classified into three main categories. Ragas of the third and last category are called Sankirn ragas are also called mixed (Mishar) ragas, that is, when more than two ragas mix so well that only a Guru (Music Teacher) can tell his disciples (Student) that  Which  Notes ( swar) group belongs to which raga, then it is called a Sankirn raga, like Khat raga, khat raga is also a Sankirn raga because 6 ragas are mixed in it, but which 6 ragas are there, there are differences among different gharanas and gurus .is a matter of differenceThe mixture of two ragas is also called a Sankirn raga, as the name suggests in the raga Basant Bahar, two ragas are mixed, Basant and Bahar, the Sankirn raga in which two ragas are mixed, usually the aroh of one raga and avroh the other. Many times in such ragas, there is a Purvanga of one Raga and Uttarang of another Raga. Sometimes two ragas are mixed with such purity that to separate them is to destroy the freedom of the raga. Even if such ragas are not called Sankirn ragas, it is appropriate. In these, there are also unending differences, such as Purvanga is of Puriya in Raga Pooriya Kalyan and that of Uttarang Kalyan. Even if it is not called a narrow raga, it is appropriate. In Raga Ahir Bhairav, there is Bhairav ​​in Purvanga, but it is difficult to decide whether there is kafi in utraang or Khamaj. Even if  Sankirn ragas are considered as mixed ragas, then ragas like Mishr Bhairavi will also be placed in this category, even though in a pure Bhairavi raga the swar groups of other ragas are taken only for a moment in the form of oblivion. In this classification, no table of Sankirn ragas is often found in any text. Bhatkhande ji has said that the caste of narrow ragas is complete, but it is more appropriate to call it a complete curve, whereas Acharya Brihaspati ji has called such ragas casteless.  The names of many Sankirn ragas do not reveal their constituent ragas, e.g. in the name of raga mishra pillu, it cannot be known which ragas are mixed in it. If the raga Bairagi Bhairav ​​is considered Sankirn, then it has to be accepted that the trend of the raga also makes it narrow because the raga Bairagi Bhairav ​​has Bhairav ​​in its Purvanga, the Sharang’s vowels are in the gross form in the Uttarang, but even though the form is not soft, Bhairav’s form is  It remains the same, but the gait is definitely of Sharang, even though justice is done on the middle as compared to the fifth,

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भारतीय शास्त्रीय संगीत में शुद्ध,छायालग और संकीर्ण राग क्या होते हैं?

   शुद्ध राग

🎹दोस्तो जिन रागों के आरोह और अवरोह में एक ही जैसे स्वर हों मतलब किसी अन्य राग की झलक या छाया जिन रागों में ना नज़र आती हो तो ऐसे ही रागों को शुद्ध राग कहा जाता है जैसे कि राग बिलावल इसके आरोह के स्वर हैं स रे ग म प ध नी स और अवरोह के स्वर हैं स नी ध प म ग रे स लेकिन अगर इस राग के आरोह में बिलावल के स्वर होते और अवरोह में किसी और राग के स्वर होते तो ये राग शुद्ध श्रेणी का ना होकर छायालग या संकीर्ण श्रेणी का राग कहलाता, अत: तो जिस राग के आरोह और अवरोह के स्वर एक जैसे हों उन्हें शुद्ध राग कहा जाता है.
 
 
 

छायालग राग

🎹दोस्तो जिन रागों के दो रागों का मिश्रण हो यानी आरोह में कुछ और स्वर हों और अवरोह में किसी अन्य राग के स्वर हों तो ऐसे रागों को छायालग राग कहते हैं ऐसे रागों के नाम से ही पता चल जाता है कि ये छायालग राग हैं जैसे कि बसंत बहार अहीर भैरव पूरीया धनाश्री,

  संकीर्ण राग 

🎼दोस्तो संकीर्ण श्रेणी के रागों को विशुद्ध रूप में भारत के संगीत की अन्यत्र कहीं भी न पाई जाने वाली विशेषता के रूप में लिया जाता है,इन रागों को समझने और स्मरण करने के लिए इनको अलग-अलग श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है, भारतीय संगीत के इतिहास के मध्यकाल में किसी समय किसी संगीतशास्त्री ने रागों का एक ऐसा वर्गीकरण प्रस्तुत किया था, जिसमें सारे रागों को तीन मुख्य श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया । तीसरी व अन्तिम श्रेणी के रागों को संकीर्ण राग कहा जाता है, संकीर्ण रागों को मिश्र राग भी कहते हैं, यानी जब दो से अधिक राग इस तरह आपस में भली भांति घुल – मिल जायें कि केवल एक गुरु ही अपने शिष्यों को ये बता पाये कि कौन सा स्वर समूह किस राग का है तो इसे संकीर्ण राग कहा जाता है , जैसे कि खट राग, आप राग भी एक संकीर्ण राग है क्योंकि इसमें 6 राग मिले हुए हैं , किन्तु कौन से 6 राग हैं यह भी विभिन्न घरानों और गुरुओं में मतभेद का विषय है । दो रागों के मिश्रण को भी संकीर्ण राग कहते हैं , जैसे राग बसन्त बहार में नाम से ही पता चलता है, बसन्त और बहार दो राग मिले हुए हैं, जिस संकीर्ण राग में दो राग मिले होते हैं , उनमें प्रायः एक राग की आरोही और दूसरे राग की अवरोही होती है । कई बार ऐसे रागों में एक राग का पूर्वांग और दूसरे राग का उत्तरांग होता है । कई बार दो राग इस शुद्धता से घुले – मिले होते हैं कि इन्हें पृथक् करना राग की स्वतन्त्रता को नष्ट करना होता है । ऐसे रागों को संकीर्ण राग न कहें तो भी उचित होता है । इनमें न समाप्त होने वाला मतभेद भी पाया जाता है , जैसे राग पूरिया कल्याण में पूर्वांग पूरिया का है और उत्तरांग कल्याण का । इसे संकीर्ण राग न भी कहें तो भी उचित है । राग अहीर भैरव में पूर्वांग में तो भैरव है , किन्तु यह निर्णय करना कठिन है कि अत्तरांग में काफी है कि खमाज । संकीर्ण रागों को यदि मिश्र राग भी माने तो मिश्र भैरवी जैसे राग भी इस श्रेणी में रखे जायेंगे चाहे शुद्ध भैरवी राग में अन्य रागों के स्वर समूह तिरोभाव के रूप में क्षण – मात्र ही लिए जाते हैं । इस वर्गीकरण में संकीर्ण रागों की कोई तालिका किसी ग्रन्थ में प्रायः नहीं मिलती । भातखण्डे ने तो संकीर्ण रागों की जाति सम्पूर्ण कही है , किन्तु इसे वक्र सम्पूर्ण कहना अधिक उचित है , जबकि आचार्य बृहस्पति जी ने ऐसे रागों को जातिहीन कहा है । उनका विचार था कि वर्ण शंकर अपने – आप में ही एक स्वतंत्र जाति कई संकीर्ण रागों के नामों से उनके घटक रागों का पता नहीं लगता , जैसे राग मिश्र पिल्लू के नाम से यह विदित नहीं हो सकता कि इसमें किन रागों का मिश्रण है । यदि राग बैरागी भैरव को संकीर्ण मानें तो यह स्वीकार करना होगा कि राग के चलन से भी संकीर्ण बनते हैं क्योंकि राग बैरागी भैरव के पूर्वांग में भैरव है , उत्तरांग में शारंग के स्वर स्थूल रूप में अवश्य हैं किन्तु स्वरूप कोमल नि होने पर भी भैरव का ही रहता है , परन्तु चाल अवश्य शारंग की है , चाहे न्याष पंचम की अपेक्षा मध्यम पर भी होता है , किन्तु कोमल नी पर ठहरा नहीं जाता , चाहे यह अलंघनमूलक बहुत्व का स्वर है, किन्तु विधान्ति ना होने से शारंग की छाया नहीं आती ।

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Hello friends, My Name is Kulwinder Jolly (Mr.jolly) I am a Youtuber and Writer.

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